मंगलवार, फ़रवरी 23

डिज़िटल विश्व : असंभव सम्भव होगा


2016 Virtual Reality का वर्ष है । हालांकि इसकी पुष्टि  महाभारत काल  में संजय ने कर दी थी । इस पर एक वीडियो 3 साल पहले से मौजूद है । विज्ञान का यह चमत्कार महाभारत काल को झूठा अथवा मिथक समझने वालों की आँखे खोल देगा । सनातन काल यानी अनादि काल  से चली आ रही व्यवस्था के लचीले होने की वज़ह से भारत में एकाधिक अवधारणाऐं   बहुत आज भी अस्तित्व में हैं । जो सख्त है वो टूटता है । पंथ मत अवधारणा परिवर्तनशील हों वर्ना परिवर्तन से अप्रभावित रह कर रूढ़ि एवं अप्रिय लगती हैं । अगर भारतीय सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को दर्शन के ऐनक से देखें तो अपेक्षाकृत अधिक बदलाव हुए हैं । मित्रो हिंदुत्व कोई धर्म नहीं वरन सनातन परन्तु परिवर्तनशील व्यवस्था है । यहाँ जनतंत्र सर्वोच्च है । बार बार स्वीकार्य हुआ । हर्ष के काल में ग्राम स्तरीय वैसी व्यवस्था थी जैसी आज की पंचायती राज व्यवस्था । रामायण काल में आदिवासी कबीलों को स्वायत्ता थी । पर  कुछ ख़ास  वर्ग के लोग ये व्यवस्था नहीं चाहते लोग रामायण और महाभारत काल को नकारते नज़र आते हैं । ताकि प्राचीनतम प्रणालियों का अंत हो । इस हेतु प्रमाण ठीक उसी तरह सक्रियता से मिटाने की कोशिश जारी हैं जैसे  कई संस्कृतियों को नष्ट किया गया और किया जा रहा है  । तात्पर्य ये कि एक तरह की नवसाम्प्रदायिकता को गढ़ा जा रहा है । मेरा मानना है हर मान्यता को उसके प्रतीकों के चिन्हों के साथ नष्ट न किया जावे अन्यथा सभ्यता के स्थूल प्रतीक भी न मिलेंगे न अक्षर-साहित्य होगा । पर ध्यान रहे बाबा के बाद कविता भले ख़त्म मानी जा रही हो अनुगुंजित शब्द व्योम में गूंजते है । जो कभी न कभी Virtual Reality मेथड के ज़रिये वापस ले आए जा सकते हैं ।  राम थे तो उनका दर्शन जो ध्वनि में मौज़ूद था ठीक वैसे ही पुनर्लेखित किया गया जैसे सल्ल ने कुरआन परा ध्वनि से प्राप्त आदेशों संदेशों को लिखा । उसके पहले वेद कहे गए उनको लिखा गया । विद्वान एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व जब भी जो भी बोलते हैं वो प्रभावी ही होता है । ध्वनि में गाम्भीर्य होता है । आप किसी भी विद्वान् को सुनिए उसकी वाणी सहज ज़ेहन में प्रवेश करती है । ऐसी वाणी में अधिक स्थायित्व भी होता है । व्योम में तैरती ये ध्वनियाँ लेखकों विचारकों का ज्ञान स्रोत है । जिनके मष्तिष्क इतने बेहतरीन स्कैनर एवं रिकार्डर होते है जो ऐसी गंभीरता भरी धनात्मक  ध्वनि तंरगों को अपने में समाहित कर लतीं हैं । आप समझिये शास्त्रों में परा, पश्यन्ति, मध्यमा, वैखरी ये चार ध्वनियाँ वर्गीकृत हैं । जिसमें परा को हम लेखक कवि विचारक चिंतक शीघ्र पकड़ ही लेते हैं । ऐसे ही  घटनाएं अगर पुनर्जीवित अथवा पुनः दिखने लगें तो इसे अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता । क्योंकि दृश्य तरंगो में बदले जा ही रहे हैं तो मानव मशीनों की सहायता से अगले  30 से 40 बरस में यह सहजता से कर पाएगा । तब मैं तो न रहूँगा पर कुछ मुझे पुनर्जीवित कर सकेंगे । ये एक स्वप्न नहीं पर सत्य है क्योंकि जिस गति से विज्ञान के क्षेत्र में डिज़िटल तकनीकी का दखल बढ़ रहा है उससे तय है क़ि ऐसा संभव हो  
गिरीश बिल्लोरे "मुकुल

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