शनिवार, फ़रवरी 22

क्या ये चुनौती है न्यू-मीडिया ? (भाग-01)

                                                   के. एम. अग्रवाल कलावाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालयकल्याण(प) के हिंदी विभाग द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान  आयोग के सहयोग से 9-10 दिसबर 2011 को दो दिवसीयराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाना था जो केंद्रित थी "हिन्दी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनायें" विषय पर   डॉ.मनीष कुमार मिश्रा का स्नेहिल आमंत्रण सम्पूर्ण व्यवस्था, श्रीमति अनिता कुमार जी ने भी अपने कालेज में मेरा वक्त्य सुनिश्चित किया था यहां तक कि रवी भैया आभास-श्रेयश, काकाजी श्रीयुत रमेश नारायण बिल्लोरे जी ने बहुत सारी व्यवस्थाएं तय कीं थीं .. कई सारे प्रोग्राम तो फ़ोन पे तय हो गये थे कुछ तय हो जाते वहां जाकर  सब कुछ सटीक समयानुकूतित था कि  7.12.2011 की रात मुझ पर  अस्थमेटिक हमला हुआ सपत्नीक कल्याण और फ़िर मुम्बई जाना अब किसी सूरत में संभव न था. जबलपुर से नागपुर फ़िर वहां से फ़्लाईट पकड़नी थी .जात्रा के लिये  सजा सजाया साजो सामान और तेज़ बुखार खांसी एक विपरीत परिस्थिति डाक्टर ने भी बिस्तर से न हिलने की सलाह दी थी. श्रीमति अनिता कुमार जी तो शायद आज़ तक नाराज़ है. नाराज़गी ज़ायज़ है भई .. होनी भी चाहिये ...आचार्य कालेज मुम्बई के बच्चे उस दौर में मुझसे वेबकास्टिंग का हुनर जो सीखते जब लाइव स्ट्रीमिंग के लिये गूगल बाबा ने भी न सोचा था .. अस्ट्रीम और बैम्बशर दो ऐसी साइट्स मेरे हाथ लगी थीं जिनके ज़रिये एक साथ हज़ारोंलाखो  लोग किसी कार्यक्रम से जुड़ जाते चाहे वे कहीं भीं हों. ये करिश्मा खटीमा-ब्लागर्स मीट   की लाइव स्ट्रीमिंग में हो भी चुका था . स्ट्रीमिंग पर कई दिनों तक काम किया था कई सारे प्रसारण किये "समीरलाल बवाल और समाधिया से बातचीत " - ये तो एक नमूना था हिंदी ब्लागिंग में टेक्स्ट के अलावा आडियो कंटेंट्स तो पुरानी बात थी तब ब्लागिंग में वीडियों कंटेंट्स की मौज़ूदगी एक करिश्मा ही तो था. मुम्बई जाता बहुत कुछ हासिल होता पर जितना भी हासिल होना था हुआ  गूगल को इस दिशा में सोचना पड़ा कि लोग अब लाइव स्ट्रीमिंग के आकांक्षी हैं. हैंगआउट और लाइव ओन यू-ट्यूब को इसी तरह की पहल की श्रेणी में रखना ग़लत न होगा.  अब तो मतदान केंद्रों की लाइव स्ट्रीमिंग सभी ने अपना ली है. वो दिन दूर नहीं जब हर पी सी से एक चैनल उपजेगा. न्यू-मीडिया खबरिया चैनल्स के लिये एक सूचना-स्रोत हो सकता है. (अभी कई मामलों में है भी )   प्रिंट मीडिया तो न्यू-मीडिया का भरपूर और सार्थक प्रयोग कर भी रहा है.
       तो लाइव स्ट्रीमिंग के तीव्र होते ही  खबरिया-चैनल्स को कोई खतरा है ? तो जान लीजिये आज़ से बरसों पहले जब फ़िल्में सिनेमाघरों में देखी जातीं थीं तब आम आदमी का मनोरंजन व्यय बेहद अधिक था. मुझे पांच रुपए खर्चने होते थे . पर अब दस बीस फ़िल्में मेरे सेल फ़ोन में उतनी ही कीमत पर देख सकता हूं. वो भी इच्छानुसार . 
क्रमश: जारी......................  


कोई टिप्पणी नहीं: